कुंभलगढ़ दुर्ग में महाराणा प्रताप जन्म कक्ष वर्ष में एक बार खुला, 9 दरवाजों के पार झलकता ऐतिहासिक स्थल

कुंभलगढ़ दुर्ग में महाराणा प्रताप जन्म कक्ष वर्ष में एक बार खुला, 9 दरवाजों के पार झलकता ऐतिहासिक स्थल

Maharana Pratap birth chamber in Kumbhalgarh

Maharana Pratap's birth chamber in Kumbhalgarh

उदयपुर: उदयपुर स्थित कुंभलगढ़ दुर्ग एक बार फिर महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती पर चर्चा में है। मेवाड़ के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म इसी ऐतिहासिक दुर्ग के बादल महल स्थित एक विशेष कक्ष में हुआ था। यह कक्ष वर्षभर बंद रहता है और केवल महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर ही श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए खोला जाता है।

 

इतिहासकारों के अनुसार, महाराणा प्रताप का जन्म हिन्दू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, रविवार, विक्रम संवत 1597 को इसी कक्ष में हुआ था। लगभग 10×10 फीट का यह कमरा कुंभलगढ़ दुर्ग की ऊंचाई पर स्थित है और अपनी रणनीतिक बनावट के कारण अत्यंत सुरक्षित माना जाता था। इस स्थान तक पहुंचने के लिए दुर्ग के नौ विशाल दरवाजों से होकर गुजरना पड़ता था, जिससे किसी भी दुश्मन के लिए यहां पहुंचना लगभग असंभव था।

कक्ष की संरचना भी उस समय की उन्नत वास्तुकला को दर्शाती है। इसमें सीमित रोशनी और वायु प्रवेश की व्यवस्था थी। दीवारों में दीपक रखने के लिए छोटी-छोटी ताकें बनाई गई थीं, जबकि गुंबदनुमा छत इस प्रकार निर्मित है कि गर्मी और बारिश का प्रभाव न्यूनतम रहे। यह कक्ष अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है और इसकी ऐतिहासिक संरचना को सुरक्षित रखा गया है।

 

इतिहासकार कुबेर सिंह सोलंकी के अनुसार यह स्थल मेवाड़ की अमूल्य धरोहर है। इसे सामान्य दिनों में नहीं खोला जाता ताकि इसकी मूल संरचना सुरक्षित रह सके। हर वर्ष महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर यहां विशेष पूजा-अर्चना और पुष्पांजलि का आयोजन किया जाता है।

 

वर्ष 1993 में कुंभलगढ़ दुर्ग को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किए जाने के बाद इतिहासकारों की एक समिति ने गहन अध्ययन और शोध के आधार पर इस कक्ष को महाराणा प्रताप का जन्मस्थल माना था। इसके बाद से इस स्थान के संरक्षण और पहचान को और अधिक मजबूती मिली।

 

इतिहास यह भी बताता है कि महाराणा प्रताप का बचपन कुंभलगढ़ और अरावली क्षेत्र के आदिवासी गांवों में बीता था। भील समाज के साथ उनके गहरे संबंध थे, और उन्हें स्नेहपूर्वक ‘कीका’ कहा जाता था। यही कारण है कि कई ऐतिहासिक दस्तावेजों में उनका उल्लेख ‘कीका राणा’ के रूप में भी मिलता है।

 

आज भी यह स्थल मेवाड़ की शौर्यगाथा और राजपूताना इतिहास का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है, जहां हर साल श्रद्धालु महाराणा प्रताप की वीरता और विरासत को नमन करने पहुंचते हैं।